Dhara Ke Khilaf

“मैं तो तैर रहा हूँ कब से धारा के खिलाफ
सांस लेने के बहाने पानी के बाहर सर निकालकर
देखते हुए बादलों का रुख”

“जहाज कागजी ताउम्र नहीं चलने का
सम्हल जा अभी वक़्त है सम्हलने का”

“जिसे जिन्दगी कहते हैं, राज है गहरा
पतझड़ के साथ सावन
दरिया के साथ सहारा”

Leave a Reply

Name *
Email *
Website